
Identity vs Humanity: Issue दाढ़ी का नहीं, दिमाग का है। भारत के सबसे ज़रूरी डिबेट का सेंटर होना चाहिए — कट्टरता व्यक्ति की गलती है, धर्म की नहीं! पर अफसोस, हमारे देश में TRP और Timeline दोनों को मसाला चाहिए, इसलिए भीड़ पूरी कम्युनिटी पर मोहर लगा देती है।
मैं ब्राह्मण, पत्रकार, बुद्धिजीवी क्लास से आया हूं — यह सब पहचान है। लेकिन अगर कल को मैं कट्टर बन जाता हूं (भगवान न करें!), तो ग़लती मेरी होगी, सारे ब्राह्मणों की नहीं, सारे हिंदुओं की नहीं, और धर्म की तो बिल्कुल नहीं।
यही बात मुस्लिमों पर भी उतनी ही लागू होती है— एक की गलती को 20 करोड़ लोगों पर थोप देना, सबसे बड़ा बौद्धिक आलस है।
“Educate, Empower, Include” — यही असली National Security Strategy
जब किसी भी समाज को पढ़ने, लिखने, आगे बढ़ने, सपना देखने का हक मिलता है… तो वो अपने घर में कट्टरता का ठेका रखने वाले ‘ठेकेदारों’ को खुद ही बाहर फेंक देता है।
सीधी सी बात— जो समझदार होता है, वो उकसाने वालों के झांसे में नहीं आता। जिसे अपनापन मिलता है, वो नफरत नहीं पालता। इसलिए असली काम यह नहीं कि किसी समुदाय को शक की नज़रों से देखा जाए। बल्कि असली काम है— उन्हें विश्वास दिलाना कि “ये देश आपका भी उतना ही है जितना मेरा।”

देश सबका है — और इसे चलाने के लिए सबकी ज़रूरत
भारत की ताक़त इसकी विविधता है। आप हिंदू हैं, कोई मुस्लिम है, कोई सिख है, कोई ईसाई…लेकिन देश एक है — और इसे विकसित करने के लिए दिल, दिमाग और मेहनत हर धर्म से आएगी।
जो लोग कहते हैं — “ये देश हमारा ज़्यादा, तुम्हारा कम”— असल में वही लोग इस देश की प्रगति को सबसे बड़ा नुकसान पहुंचाते हैं। “देश को AI, चंद्रयान, G20 तक ले जाने वाले हम सब… और पीछे खींचने वाले बस वही जो हर बात में ‘तुम बनाम हम’ निकाल लेते हैं।”
जब अपनापन मिलता है, तो नफ़रत की फैक्ट्री ऑटोमेटिक बंद हो जाती है
सवाल धर्म का नहीं, व्यवहार का है। सवाल पहचान का नहीं, इंसानियत का है। सवाल “तुम कौन हो” का नहीं, “तुम क्या कर रहे हो” का है। अगर हर युवा को यह महसूस हो जाए कि— वो outsider नहीं है, वो इस देश का बराबरी वाला stakeholder है, तो कट्टरता वाले लोग खुद ही बेरोज़गार हो जाएंगे।
